Monday, July 27, 2009

तेरे ख्वाब....

होती है जब पास तू ख्वाबों में भी...

जैसे जन्नत मिल जाती है ....

तुझे मुझसे जुदा करने....

जाने क्यों रोज़ सुबह हो जाती है...

जानता हूँ ख्वाब तेरा....

बस एक छलावा है...

पर फ़िर भी तुझे बार बार देखने....

पलकें ख़ुद बखुद जुड़ जाती है.....

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