Sunday, May 4, 2008

शिकवा....

मसरूफ हो यूं दुनियादारी में,
की तन्हा हमें कर दिया,
कहीं ये इसलिए तो नहीं,
की हमने ख़ुद को दुनिया में हट के कह दिया....

या शायद तुमने उस बात को,
ज्यादा ही संजीदगी से ले लिया,
की जब मैने कहा था तुमसे,
की जीने के लिए तुम्हारी यादें ही बहुत है,
या ये उस बात की सज़ा है,
की कुछ ज्यादा ही प्यार कर लिया,

1 comment:

advocate rashmi saurana said...

vha sab ki sab rachanaye bhut achhi hai. or bhi achha likhe iske liye shubhakamnaye.